ब्रह्मगिरि पहाड़ी के नीचे मंदिरों के नगर में बना पत्थर का एक छोटा कुंड — और परंपरा की मान्यता में गोदावरी का वास्तविक उद्गम, जहाँ शैव अखाड़े अमृत स्नान करते हैं।
गोदावरी त्र्यंबकेश्वर के ऊपर ब्रह्मगिरि पहाड़ी से निकलती है। पहाड़ी ढलान से नीचे आने वाली जलधारा लुप्त हो जाती है और परंपरा मानती है कि वह कुशावर्त के पत्थर के कुंड में फिर प्रकट होती है — इसलिए अनुष्ठानिक रूप से इसे नदी का वास्तविक उद्गम माना जाता है।
यह नाम ऋषि गौतम की कथा से आया है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उतरती हुई नदी को कुश घास के एक वलय से थाम लिया था — कुश-आवर्त, अर्थात कुश का घेरा। यह दीवारों और सीढ़ियों से घिरा एक छोटा कुंड है, और जिसने गोदावरी को उसके निचले प्रवाह में दक्कन की एक विशाल नदी के रूप में देखा हो, उसके लिए यहाँ खड़े होना एक अनोखा अनुभव है।
कुछ ही कदम की दूरी पर त्र्यंबकेश्वर मंदिर स्थित है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है — और उनमें अनूठा है, क्योंकि यहाँ के लिंग के तीन मुख हैं, जिन्हें एक साथ ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्वरूप माना जाता है।
यह नगर भारत में नारायण नागबली, कालसर्प शांति और त्रिपिंडी श्राद्ध के अनुष्ठानों के प्रमुख स्थानों में भी है — ये पितृ-बाधा के निवारण के लिए किए जाने वाले संस्कार हैं। किसी मेले से अलग, तीर्थयात्री इनके लिए वर्षभर आते हैं।
नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ में शैव अखाड़े यहाँ कुशावर्त में अपना अमृत स्नान करते हैं, जबकि वैष्णव अखाड़े नाशिक के रामकुंड में अलग दिन स्नान करते हैं। आगामी चक्र में कुशावर्त की तिथि 12 सितंबर 2027 है, जो रामकुंड में वैष्णवों के स्नान के अगले दिन है।
कुंड स्वयं छोटा है और नगर सघन तथा पहाड़ियों से घिरा हुआ है, इसलिए स्नान के दिन त्र्यंबकेश्वर किसी भी कुंभ के सबसे कड़े प्रबंध वाले स्थानों में होता है। आवागमन कई घंटे पहले से नियंत्रित कर दिया जाता है, वाहन बहुत दूर रोक दिए जाते हैं और वहाँ तक पैदल मार्ग लंबा है। इसे ध्यान में रखकर योजना बनाएँ और उसी सुबह आने के बजाय एक दिन पहले पहुँचें।
यात्रा जारी रखें — अगला भाग
संपूर्ण सिंहस्थ: 31 अक्टूबर 2026 को ध्वजारोहण, अमृत स्नान और 24 जुलाई 2028 तक की पूरी अवधि।
पढ़ें: सिंहस्थ 2027 →